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जून 11, 2010 / karishna

सनातन संस्कृ्ति और धर्म

हमारे यहाँ श्रृषियों नें धर्म की व्याप्कता तथा उदारता के विषय में कितनी सुन्दर बात कही है।

धर्म यो बाधते धर्मो न स: धर्म: कुधर्मक: ।

अविरोधातु यो धर्म: स धर्म: सत्यविक्रम।।

अर्थात हे सत्य विक्रम्!  जो धर्म दूसरे का बाधक हो,वह धर्म नहीं कुधर्म है। धर्म तो वही है जो किसी दूसरे धर्म का विरोधी न हो।

धर्म से क्या नहीं प्राप्त हो सकता? महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व में महर्षि वेद व्यास  जी ने बडे जोरदार शब्दों में अपनी अन्तर्पुकार समाज के हित में कही है। वे कहते हैं कि ” मैं दोनों हाथ ऊपर उठा कर पुकार-पुकार कर कह रहा हूं,परन्तु मेरी बात कोई नहीं सुन रहा कि धर्म से केवल मोक्ष ही नहीं अपितु अर्थ और काम की भी प्राप्ति होती है। फिर भी लोग उसे ग्रहण क्यों नहीं करते ?

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद ।

धर्म त्यजेज्जिवितस्यापि हेतो:

नित्यो धर्म: सुख दुखे स्वनित्ये

जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य: ।।

अर्थात कामना से,भय से,लोभ से अथवा जीवन के लिए भी धर्म का त्याग न करें। धर्म ही एक नित्य है,सुख दुख तो अनित्य है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति धर्म का पालन करता है तो धर्म ही उसकी रक्षा करता है तथा नष्ट हुआ धर्म ही उसके पतन का कारण बनता है। अतैव जीवन में सदैव धर्म का पालन करना चाहिए।

उपरोक्त वचनों से यह स्पष्ट होता है कि सनातन संस्कृ्ति में धर्म की परिभाषा संकीर्ण तथा एकदेशीय कभी नहीं रही,अपितु ये तो प्राणीमात्र के लिए हितकारी ओर व्यापक है। जिससे सब का कल्याण हो,चाहे वह किसी भी देश,जाति अथवा सभ्यता का मनुष्य क्यों न हो। जिससे सब का व्यापक हित हो, वही धर्म है।

इस सृ्ष्टि क्रिया को जिस नियम ने धारण कर रखा है, जिस नियम से सृ्ष्टि का संचालन ओर विकास प्रकृ्ति कर रही है  तथा जिस क्रिया से प्राणि क्रमश: उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच सकता है तथा जिससे उसकी आध्यात्मिक ,अधिदैविक और अधिभौतिक उन्नति हो सकती है,चाहे वह कठिन साध्य ही क्यों न हो——-वही धर्म है।

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4 टिप्पणियाँ

टिप्पणी करे
  1. पं.डी.के.शर्मा "वत्स" / जुलाई 30 2010 7:19 अपराह्न

    धर्म और संस्कृ्ति पर बहुत सही विचार रखे आपने…..उम्दा पोस्ट!
    आभार्!

  2. swamisamvitchaitanya / सितम्बर 17 2010 5:34 अपराह्न

    dharm me dusra hota hi nahi hai dharm arth kam aurmoksh ka sabke liye
    sadhan hota hai

  3. सुज्ञ / नवम्बर 19 2010 12:31 पूर्वाह्न

    धर्म-संस्कृति पर प्रभावशाली दर्शन प्रस्तूत करता सुक्त सह आलेख!!

    आभार

  4. निरंजन मिश्र / जनवरी 17 2011 9:50 अपराह्न

    सभी पाठको को सूचित किया जाता है कि पहेली का आयोजन अब से मेरे नए ब्लॉग पर होगा …

    यह ब्लॉग किसी कारणवश खुल नहीं प रहा है

    नए ब्लॉग पर जाने के लिए यहा पर आए
    धर्म-संस्कृति-ज्ञान पहेली मंच

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